Thursday, November 7, 2013

प्रिय बिनसांप्रदाियकता

प्रिय बिनसांप्रदाियकता, 
 आजकल जहां देखो तुम्हारी बाते हो रही हे। 
ऐसा क्या जादु हे तुम में की हर पक्ष खुद को बिनसांप्रदायिक साबित करने में लगा हे।
ओर इसके लिऐ कोई टोपी पहनता हे , 
तो कोई टोपीवालो सें केक कटवाता हे। 
मगर देश का ईतिहास ये दिखाता हे,
कोई हिन्दुपरस्त तो कोई मुस्लिमपरस्त होता हे।
दंगो में जलती लाशो पर सब पक्ष अपनी राजनिती की रोटीया शेकते हें,
दंगो की बुझी अाग को रेह रेह के हवा देते हे।
सालो की महेनत सें बने आशियाने उजाडते हे ये लोग,
सत्ता के लिऐ कितने गीरते हे ये लोग। 
              
                              --- सुरेश त्रिवेदी

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